UPPSC भर्तियां में जांच रुकने से अभ्यर्थी प्रभावित

राज्य ब्यूरो, प्रयागराज : पीसीएस 2015 और एपीएस यानी अपर निजी सचिव 2010 की भर्ती में उप्र लोक सेवा आयोग से हुई गड़बड़ी के शिकार अभ्यर्थियों का अब सीबीआइ जांच से भी भरोसा टूटने लगा है। सीबीआइ के ‘स्लीप मोड’ में हो जाने से इस पर अनिश्चितता बरकरार है कि जांच के लिए टीम लीडर की नियुक्ति कब होगी। सरकार की ओर से भी जांच आगे बढ़वाने की पहल न होने से सूबे के उन 25 हजार से अधिक अभ्यर्थियों की निराशा बढ़ी है जिनका इन दोनों भर्तियों में हुई गड़बड़ी से सीधा नुकसान हुआ है।
उप्र लोक सेवा आयोग (यूपीपीएससी) की यही दो भर्तियां ऐसी हैं जिनमें एक से सीबीआइ जांच की शुरुआत और दूसरी से ठप हो गई। पीसीएस 2015 में एक जाति विशेष के अभ्यर्थियों को चयन में प्राथमिक देने के लिए सभी नियम और कायदे ताख पर रख दिए गए। जिसके विरोध में हुए बड़े आंदोलन को देखते हुए प्रदेश सरकार ने इसे संज्ञान लिया और अखिलेश सरकार के पांच साल के दौरान यूपीपीएससी से हुई सभी भर्तियों की सीबीआइ जांच शुरू करा दी। इससे चयन से वंचित अभ्यर्थियों की उम्मीद को नई रोशनी मिली थी। लेकिन, जून 2018 में एपीएस 2010 भर्ती की जांच के लिए प्रदेश सरकार में पत्रचार और जांच की सिफारिश होते ही अप्रत्याशित रूप से सीबीआइ के कदम जहां के तहां जाम हो गए।
गड़बड़ी से एक अनुमान के मुताबिक सूबे के करीब 25 हजार अभ्यर्थियों का सीधा नुकसान हुआ। पीसीएस 2015 में तो नौ हजार से अधिक अभ्यर्थियों की शिकायतें ही दर्ज हुई थी। जबकि एपीएस में यूपीपीएससी के भाई भतीजावाद के चलते योग्य अभ्यर्थी चयन पाने की दौड़ में शामिल होने से पहले ही बाहर कर दिए गए। यहां तक कि 17 नवंबर को टीम लीडर राजीव रंजन की प्रतिनियुक्ति समाप्त होने के बाद से अब तक सीबीआइ की ओर से किसी दूसरे अधिकारी की नियुक्ति न करना अभ्यर्थियों के भरोसे पर सीधे चोट कर रहा है।